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बरसात में खुली पोल जनता के पैसों का बंदरबांट

📰 देशभर में पुल और सड़कें धंसने की घटनाएं — भ्रष्टाचार बन गया है जनता की जान का दुश्मन।

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बरसात का मौसम शुरू होते ही देश के अलग-अलग राज्यों से पुल गिरने और सड़कों के धंसने की खबरें आने लगी हैं। गुजरात के वडोदरा, सूरत, और आणंद जिलों में बीते कुछ दिनों में कई पुल अचानक धराशायी हो गए। इनमें से कुछ पुलों का निर्माण हाल ही के वर्षों में हुआ था। वहीं मध्य प्रदेश के ग्वालियर, शिवपुरी और इंदौर जैसे शहरों से सड़कें धंसने और बड़े-बड़े गड्ढों की खतरनाक तस्वीरें सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी इसी तरह की खबरें तेजी से वायरल हो रही हैं।

इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या ये सिर्फ प्राकृतिक आपदा है? या फिर सरकारी सिस्टम में बैठे भ्रष्ट ठेकेदारों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत का नतीजा?

“जनता भाड़ में जाए, बस जेबें भरनी चाहिए” — यही है सच्चाई?

आज देश के कई निर्माण कार्य सिर्फ कागज़ों पर ही गुणवत्तापूर्ण होते हैं। असल में, जैसे ही किसी प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलती है, उसी दिन से कमीशनखोरी शुरू हो जाती है। एक ठेकेदार, एक इंजीनियर और एक नेता — तीनों के बीच पहले से तय होता है कि किसे कितनी रकम खानी है। यही वजह है कि जो पुल 50 साल चलना चाहिए, वह 5 साल में ही बह जाता है। जो सड़कें करोड़ों की लागत से बनी हैं, वे पहली बारिश में ही गड्ढों में बदल जाती हैं।

इस पूरे खेल में जनता की सुरक्षा, सुविधा और ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं होती। हादसे हों, जाने जाएं या विरोध हो — सरकारें सिर्फ जांच के नाम पर लीपापोती करती हैं। किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं होती, और वही भ्रष्ट सिस्टम फिर से एक नया ठेका पास कर देता है।

जवाबदेही कौन लेगा?

हर बार जनता को बताया जाता है कि "बारिश ज़्यादा हो गई", "मिट्टी कमजोर थी", "पुरानी तकनीक इस्तेमाल हुई थी" — पर सवाल यह है कि जब निर्माण हुआ था, तब इन बातों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया? क्या इंजीनियरिंग रिपोर्ट फर्जी थी? या फिर जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया गया?

अब वक्त आ गया है कि जनता सिर्फ हादसों के बाद दुख जताने तक सीमित न रहे, बल्कि भ्रष्टाचारियों से सवाल पूछे।

देश को अब ऐसे जनप्रतिनिधियों की जरूरत है जो ठेकेदारों से गठजोड़ न करें, बल्कि जनता के पैसे का सही इस्तेमाल करें।


टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
Bhaut sunder lekh

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